Thursday, 25 February 2010

तीन


मैंने तीर बनाए तीन ,
दो की नोक ही नहीं ,
एक तो चलता ही नहीं .

जो चलता ही नहीं ,
उससे शेर मरे तीन ,
दो तो मरे ही नहीं ,
एक तो भग ही गया .

जो भग ही गया ,
वो नदी में गया तीन ,
दो तो सोखी हुई,
 एक में पानी ही नहीं .

जिसमें पानी ही नहीं ,
उसमें मटके थे तीन ,
दो तो फूटे ही गए ,
एक का पेंदा ही नहीं .

जिसका पेंदा ही नहीं ,
उसमें चावल पकाए तीन .
दो तो कच्चे ही रहे ,
एक तो पका ही नहीं .

जो पका ही नहीं ,
उसे सादू ने खाया, तीन,
दो तो भोके ही रहे,
 एक ने खाया ही नहीं .

जिसने खाया ही नहीं ,
उसको सिक्के मिले तीन ,
दो तो खोटे ही रहे ,
एक तो चलता है .

धन्यवाद !!!!!!

2 comments:

  1. बहुत अच्छा ध्रुव..मारवाड़ी में ऐसी बातें मेरी मम्मी और आपके दादी मुझे सुनाते थे ...अच्छा लिखा लिखते रहो!

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